Thursday, July 2, 2009

बहुत मिलावटी है जी... पुराण चर्चा

 

मेरी पिछली पोस्ट पर मित्रों की जो प्रतिक्रियाएं आईं उनको देखने के बाद मैं दुविधा में पड़ गया। विद्वतजन की बातों को लेकर चर्चा को आगे बढ़ाया जाय या पुराण प्रपंच छोड़कर कुछ दूसरी बात की जाय। कारण यह था कि मैंने पुराणों के बारे में बहुत गहरा अध्ययन नहीं किया है। दो-चार पुस्तकों तक ही सीमित रहा हूँ। मेरा ज्ञान इस बात तक सीमित है कि यद्यपि वेद और पुराण एक ही आदिपुरुष अर्थात्‌ ब्रह्माजी द्वारा मूल रूप से रचित हैं, तथापि इनमें वर्णित ज्ञान, आख्यानों, तथ्यों, शिक्षाओं, नीतियों और घटनाओं आदि में एकरूपता होते हुए भी इनमें कुछ मौलिक भिन्नताएं है:

  • पुराण वेदों का ही विस्तृत और सरल स्वरूप है जो सामान्य गृहस्थ को लक्षित है।
  • वेद अपौरुषेय और अनादि है जिसे ब्रह्माजी ने स्वयं रचा था। किन्तु वेदव्यास जी ने जनमानस के कल्याणार्थ ब्रह्माजी द्वारा मौलिक रूप से रचित पुराण का  पुनर्लेखन और सम्पादन किया और इसके श्लोकों की संख्या सौ करोड़ से घटाकर चार लाख तक सीमित कर दी। अतः पुराण पौरुषेय भी है।
  • वेदों की साधना करने वाले योगी पुरुष ऋषि कहलाये जबकि पुराणों में वर्णित ज्ञान की बातों, मन्त्रों, उपासना विधियों और व्रत आदि का अनुसरण करने वाले योगी मुनि कहलाए।
  • वेदों की अपेक्षा पुराण अधिक परिवर्तनशील और श्रुति परम्परा पर निर्भर होने के कारण लम्बे समय तक स्मृतिमूलक रहे हैं। परिवर्तनशील प्रवृत्ति होने के कारण ही पुराणों में ऐतिहासिक घटनाओं का सटीक चित्रण मिल जाता है।

वेद-पुराण-उपनिषद वैसे तो समग्र वेद-पुराण के एक मात्र रचनाकार वेद-व्यास जी को माना जाता है लेकिन कोई भी इस विशद साहित्य का आकार जानकर यह सहज अनुमान लगा सकता है कि इतना विपुल सृजन किसी एक व्यक्ति के द्वारा अपने एक जीवनकाल में नहीं किया जा सकता।

भाई इष्टदेव जी ने मुझे मेल भेजकर याद दिलाया कि “...व्यास कोई एक व्यक्ति नहीं, बल्कि एक पूरी परम्परा हैं। जिसने भी उस ख़ास परम्परा के तहत कुछ रचा उसे व्यास कहा गया। अभी भी कथा वाचन करने वाले लोगों को व्यास ही कहा जाता है....”

मेरे ख़याल से पुराणों का स्वरूप कुछ-कुछ हमारे ब्लॉगजगत जैसा रहा है। बल्कि एक सामूहिक ब्लॉग जैसा जिसमें अपनी सुविधा और सोच के अनुसार कुछ न कुछ जोड़ने के लिए अनेक लोग लगे हुए है। बहुत सी सामग्री जोड़ी जा रही है, कुछ नयी तो कुछ री-ठेल। बहुत सी वक्त के साथ भुला दी जा रही है। लिखा कुछ जाता है और उसका कुछ दूसरा अर्थ निकालकर बात का बतंगड़ बना दिया जा रहा है। लेकिन इसी के बीच यत्र-तत्र कुछ बेहतरीन सामग्री भी चमक रही है। अनूप जी के अनुसार यहाँ ८० प्रतिशत कूड़ा है और २० प्रतिशत काम लायक माल है। यहाँ सबको स्वतंत्रता है। चाहे जो लिखे, जैसे लिखे। इसपर यदि बेनामी की सुविधा भी हो तो क्या कहने? पुराणों के साथ भी कुछ ऐसा ही हुआ लगता है।

वैदिक ऋषि परम्परा से निकली ज्ञान की गंगा पुराणों की राह पकड़कर जैसे-जैसे आगे बढ़ती गयी उसमें स्वार्थ और लोलुपता का प्रदूषण मिलता गया। धार्मिक अनुष्ठान के नामपर कर्मकाण्ड और पाखण्डपूर्ण आडम्बर बढ़ते गये। पुरोहितों द्वारा यजमान के ऊपर दान-दक्षिणा की नयी-नयी मदें लादी जाने लगीं। धर्म-भीरु जनता को लोक-परलोक का भय दिखाकर उसकी गाढ़ी कमाई उड़ाने की प्रवृत्ति पुरोहितों और पण्डों में बढ़ने लगी। यही वह समय था जब हिन्दू धर्म के प्रति आम जनमानस में पीड़ा का भाव पैदा होने लगा और गौतम बुद्ध व महावीर जैन ने इन कर्म-काण्डों और आडम्बरों के विरुद्ध बौद्ध और जैन धर्म का प्रवर्तन कर दिया। हिन्दू कर्मकाण्डों और नर्क जाने के भय से पीड़ित जनता ने उन्हें हाथो-हाथ लिया। ऐसी विकट परिस्थिति पैदा करने में इन पुराणों का बड़ा दुरुपयोग किया गया था।

तो क्या यह मान लिया जाय कि पुराण अब बेमानी हो चुके हैं? क्या इनसे किनारा करके इन्हें कर्म-काण्डी पुरोहितों के हाथ में छोड़कर अब भी उन्हें मनमानी ठगी करने देना उचित है? अन्धविश्वासों और रूढ़ियों मे पल रही एक बड़ी आबादी आजभी इनपर आस्था रखती है। जिनकी आस्था नहीं है वे भी छिप-छिपाकर सत्यनारायण की कथा करा ही डालते हैं, या जाकर प्रसाद ही ले आते हैं। कदाचित्‌ एक अन्जाना डर उन्हें यह सब करने को प्रेरित करता होगा। कुछ तो सार-तत्व होगा इनमें...!

यहाँ यह भी उल्लेख कर दूँ कि जिन कर्मकाण्डों और आडम्बरों के खिलाफ़ सन्देश देकर ये नये धर्म खड़े हुए, कालान्तर में इनके भीतर भी उसी प्रकार की बुराइयाँ पनपने लगीं। इधर आदि शंकराचार्य (८वीं-९वीं शताब्दि)ने वेदान्त दर्शन की पुनर्प्रतिष्ठा के लिए यह सन्देश दिया कि सारे वाह्याडम्बर मिथ्या हैं। एक मात्र सत्य ब्रह्म है। प्रत्येक जीवित व्यक्ति के भीतर निवास करने वाली आत्मा ब्रह्म का ही एक रूप है। भौतिक जगत एक माया है जो जीव को जन्म मृत्यु के बन्धन में बाँधे रखती है।

ब्रह्म सत्यं, जगन्मिथ्या, जीवो ब्रह्मैव ना परः

हमारे वैदिक ज्ञान भण्डार की मौलिक बातों का पुराणों में सरलीकरण कर दिया गया। कम पढ़े-लिखे गृहस्थ को सामान्य जीवनोपयोगी बातें समझाने के लिए भी धर्म का सहारा लिया गया। यहाँ धर्म का आशय केवल पूजा पद्धति और देवी देवताओं में आस्था पैदा करना नहीं रहा बल्कि मनुष्य के जीवन में जो कुछ भी धारण करने योग्य था वह धर्म से परिभाषित होता था। जो कुछ भी करणीय था उसे धार्मिक पुस्तकों में शामिल कर लिया गया और जो कुछ अकरणीय था उसके भयंकर परिणाम बताकर उन्हें रोकने की कोशिश की गयी। कदाचित्‌ शुभ-अशुभ और स्वर्ग-नर्क की अवधारणा इसी उद्देश्य से गढ़ी गयी होगी। हमारे ऋषि-मुनियों ने इन पुस्तकों को एक प्रकार से मनुष्य की आचार संहिता बना दिया था। लेकिन लालची पंडितों ने इसका रूप ही बिगाड़ दिया।

ऐसी स्थिति में इन आदिकालीन शास्त्रों को पूरा का पूरा खारिज नहीं किया जा सकता। उचित यह होगा कि इनकी समीक्षा इस रूप में की जाय कि इनमें छिपे मूल सन्देशों को अलग पहचाना जा सके और आधुनिक परिवेश में उनकी उपादेयता को चिह्नित किया जा सके। मेरा विश्वास है कि मानवकल्याण के इन सूत्रों को अपना कर और प्रसारित करके हम आजकल की अनेक सामाजिक, सांस्कृतिक और पर्यावरणीय समस्याओं का समाधान ढूँढ सकते हैं।

तो क्या आप सच्चे मोतियों की खातिर समुद्र-मन्थन करने को तैयार हैं?

(सिद्धार्थ शंकर त्रिपाठी)

नोट: सत्यनारायण की कथा में ‘कथा के माहात्म्य’ का जिक्र और मूल कथा के लोप का सूत्र मिल गया है। अगले अंक में उसकी चर्चा होगी।

24 comments:

mahashakti said...

पिछली पोस्‍ट पर नही आ पाया था, इसे भी अभी नही पढ़ पाया हूँ। बुकमार्क कर लिया जल्‍द ही समय दूँगा।

सत्यनारायण की कथा में ‘कथा के माहात्म्य’में प्रसाद में क्‍या है? पंजीरी और चरणामृत की बेस्‍ट है।

अविनाश वाचस्पति said...

मंथन करना जरूरी है
तभी मन के थनों से
दुग्‍ध प्रवाहित होगा।

Nirmla Kapila said...

मुझे अगली चरचा का बेसबरी से इन्तजार रहेगा क्यों कि मैं बचपन से जब भी सत्यनारायण की कथा सुनती तो मेरा स्ब से एक ही प्रश्न होता कि मुझे तो वो कथा सुनायें जो् इस कथा की नायिकअ ने सुनि थी बहुत ग्यानवर्द्धक आलेख हैं आपके धन्यवाद्

cmpershad said...

मंथन होगा तो ही अमृत कलश निकलेगा और इस कलश से जितना अमृत छलकेगा उतना लाभ होगा। तो छलकाएजा.......)

''ANYONAASTI '' {अन्योनास्ति} said...

पिछली चर्चा देखा नहीं यह देखा बुकमार्क करलिया है ,विद्वान् या विशेषज्ञ तो नहीं हूँ बाद में पढ़ कर कुछ कहने की कोशिश करूँगा | http://anyonasti-arth.blogspot.com/ की समालोचन सलाह , कमियों की ओर निर्देश प्रार्थनीय है

Anil Pusadkar said...

बिल्कुल तैयार हैं जी।

विवेक सिंह said...

सत्यनारायण की मूल कथा जानने की हमको भी जिज्ञासा है .

डॉ .अनुराग said...

इस विषय में इतनी ही जानकारी है जितनी गणित में ....फिर भी कहते है न कुछ चीजे अंडर लाइन की जा सकती है

Dr. Smt. ajit gupta said...

बहुत श्रेष्‍ठ पोस्‍ट है। एकदम सारगर्भित। हमारे लिए तो यही सत्‍यनारायण की कथा बन गयी है।

संगीता पुरी said...

आपका आलेख मुझे बेहद पसंद आया .. आपने सही लिखा है कि ...
"मानवकल्याण के इन सूत्रों को अपना कर और प्रसारित करके हम आजकल की अनेक सामाजिक, सांस्कृतिक और पर्यावरणीय समस्याओं का समाधान ढूँढ सकते हैं।
तो क्या आप सच्चे मोतियों की खातिर समुद्र-मन्थन करने को तैयार हैं? "
हम चाहे या नहीं .. आज नहीं तो कल सही .. सबको मंथन करना ही पडेगा .. वैज्ञानिक तो कहते हैं कि पुरानी बातों पर चिंतन मनन करने में समय गंवाने की अपेक्षा नए वैज्ञानिक विकास में समय क्‍यों न लगाया जाए .. पर वैज्ञानिक विकास के साथ ही साथ नैतिक और आध्‍यात्मिक विकास से ही मानव को सच्‍चा सुख प्राप्‍त हो सकता है .. इस बात को समझने में देर नहीं होनी चाहिए।

राज भाटिय़ा said...

समुद्र-मन्थन किजिये हम जेसे अग्णियो को भी कुछ ग्याण मिलेगा, वेसे तो ढोंगी लॊगो ने गंथो से सही अर्थ ना निकाल कर अपने पेट भरने के जरिये बना कर लोगो का विशवाश्र तोड दिया है.
आप की अगली कडी का इन्तजार रहेगा.
धन्यवाद

इष्ट देव सांकृत्यायन said...

अति उत्तम! अब आपने वैज्ञानिक विवेचन की राह पकड़ी है. इसे और आगे बढ़ाइए. कूड़ा-सार्थक का 80--20 वाला जो अनुपात है, वह अभिव्यक्ति की सभी विधाओं में है. केवल ब्लॉग और पुराण ही नहीं, साहित्य और पत्रकारिता की वस्तुस्थिति भी यही है.
और हां, सत्यनारायण की व्रत कथा का सूत्र आप जैसे और जो करें, पंजीरी मुझे ज़रूर भेज दें. कहें तो पत्रव्यवहार का पता समस कर दूं.

अभिषेक ओझा said...

पढ़ते समय खुले दिमाग से पढ़ा जाय तो काफी काम की बातें मिलती हैं. बाकी तो आपने कहा ही है,

महामंत्री - तस्लीम said...

गूढ ज्ञान को आपने सरल ढंग से प्रस्‍तुत किया है। आभार।

-Zakir Ali ‘Rajnish’
{ Secretary-TSALIIM & SBAI }

ज्ञानदत्त पाण्डेय | Gyandutt Pandey said...

हिन्दुत्व में नर्सरी से डाक्टरेट तक के धर्म ग्रन्थ हैं। पुराण प्राइमरी कक्षाओं के धर्मग्रन्थ हैं। प्रस्थानत्रयी डाक्टरेट के!:)

गिरिजेश राव said...

हम अगोर रहे हैं. . .

. .सोचता हूँ इस विद्यालय में दाखिला ले लूँ। फोटो में जितना दिख रहा है, उतना ही जान लिया तो महापंडित हो जाऊँगा। नव-वेदमार्गियों से शास्त्रार्थ करना भी आसान हो जाएगा।

फीस बताइए।

डॉ. मनोज मिश्र said...

पुराण -कथा में रोचकता तो है परन्तु यथार्थ में इनको काफी बाद में लिखा गया है ऐसा विद्वानों का मानना है .कुछ एक पुराणों की बात छोड़ दी जाये तो अधिकाँश काफी बाद की रचनाएँ हैं और यह भी सच है की इनका लेखन किसी एक नें नहीं अपितु क्रमश कई एक नें मिल कर किया है .आप अच्छा लिख रहें हैं ,पुराणों में रोचकता है और आपकी लेखनी में लय , तो हो जाय पुराण -विमर्श .

रविकांत पाण्डेय said...

वेद अपौरुषेय और अनादि है जिसे ब्रह्माजी ने स्वयं रचा था प्रिय बंधु, ब्रह्माजी ने वेदों को रचा नहीं था, वो सिर्फ़ माध्यम थे इस सत्य के प्रकटीकरण के-

पुराणं सर्वशास्त्राणां प्रथमं ब्रह्मणा स्मृतम
अनंतरं च वक्त्रेभ्यो वेदास्तस्य विनिर्गताः

ध्यान दें कि आप वेद को अनादि मानते हैं। रची हुई चीज के अनादि होने की दूर-दूर तक भी कोई संभावना नहीं है क्योंकि रचना का आदि और अंत दोनों होता है। अगर ब्रह्मा ने वेद रचे तो इसका मतलब हुआ कि ब्रह्मा से पहले वेद था ही नहीं। वैसे आलेख रोचक है और अगली कड़ी का इंतज़ार रहेगा।

Arvind Mishra said...

हाँ तैयार हैं एक और समुद्र मंथन के लिए !
श्लोकानि प्रवक्षामी यद्युकतम शास्त्र कोटिभिः
ब्रह्म सत्यम जगत मिथ्या ब्रह्म जीवैह न परः
शंकराचार्य

प्रसन्न वदन चतुर्वेदी said...

बहुत अच्छा सारगर्भित लेख.... बधाई....
आप का ब्लाग अच्छा लगा...बहुत बहुत बधाई....

Shiv Kumar Mishra said...

अति उत्तम! अब आपने वैज्ञानिक विवेचन की राह पकड़ी है. इसे और आगे बढ़ाइए. कूड़ा-सार्थक का 80--20 वाला जो अनुपात है, वह अभिव्यक्ति की सभी विधाओं में है. केवल ब्लॉग और पुराण ही नहीं, साहित्य और पत्रकारिता की वस्तुस्थिति भी यही है.

और हां, सत्यनारायण की व्रत कथा का सूत्र आप जैसे और जो करें, पंजीरी मुझे ज़रूर भेज दें. कहें तो पत्रव्यवहार का पता समस कर दूं.

Anonymous said...

सिद्धार्थ जी गहरे पानी में ही मोती मिलते हैं.
सार सार को गहि रहे थोथा दे उडाये.
आपकी अगली पोस्ट का बेसब्री से इंतजार है.

K M Mishra said...

सिद्धार्थ जी गहरे पानी में ही मोती मिलते हैं.
सार सार को गहि रहे थोथा दे उडाये.
आपकी अगली पोस्ट का बेसब्री से इंतजार है.

सतीश पंचम said...

सिध्दार्थ जी, मैंने वेद पुराण नहीं पढे, बस कहीं कहीं उल्लेखित रूप में जरूर कुछ बातें पढी हैं।

डिस्कवरी चैनल पर देख रहा था कि जंगल में हिरणी ने बच्चे को जन्म दिया और थोडी ही देर में बच्चा खुद ब खुद खडा होकर अपनी मां के थन के पास जा पहुँचा दूध पीने के लिये। तब मेरे मन में प्रश्न उठा कि आखिर इस बच्चे को किसने बताया होगा कि जाओ...अमुक स्थान पर मुंह लगाओ तो तुम्हें दूध मिलेगा।

इस विषय पर मैने पोस्ट भी लिखी थी। टिप्पणी में ज्ञान जी ने लिखा - यह तो केनोप्निषद सा है। किसने दिया पहला श्वांस?!

इस टिप्पणी से मुझे याद आया कि कुछ ऐसा ही कहीं इतिहास की एक किताब में उपनिषदों के बारे में पढा था। यम -यमी संवाद, मांडूक्य आदि।

तभी मुझे लगा कि इन किताबों को पढना चाहिये। अलबत्ता अब तक तो नहीं पढ पाया लेकिन हो सकता है आपके इन पोस्टों के जरिये कुछ पढने को मिल जाय।

उस पोस्ट का लिंक ये रहा -

http://safedghar.blogspot.com/2008/10/micropost.html