Tuesday, August 31, 2010

कार्यशाला उम्दा थी, गलती मेरी थी…

 

मेरी पिछली पोस्ट में आपने साइंस ब्लॉगिंग कार्यशाला के लिए मेरी लखनऊ की यात्रा का हाल पढ़ा था। अनेक मित्रों ने पसंद किया और मुझे अपना स्नेह दिया। मैं भी बड़ा प्रसन्न था कि अपनी प्रसन्नता भरी यात्रा और सेमिनार के अनुभव बाँटकर शायद मैने अच्छा काम किया है। उत्साह में मैने कार्यशाला के दूसरे दिन साइंस ब्लॉगर एसोसिएशन नामक ब्लॉग पर लाइव कमेण्ट्री भी पोस्ट कर डाली। (इसका गैर-योगदानकर्ता सदस्य लम्बे समय से था।) जैसे-जैसे प्रशिक्षण कार्यक्रम आगे बढ़ता जाता पोस्ट में उसका हाल जुटता जाता। दूसरे दिन के प्रथम सत्र पर एक नहीं दो पोस्ट्स सत्र के दौरान ही तैयार हो गयीं और तत्क्षण पब्लिश भी हो गयीं। मुझे तो बड़ा मजा आया। आदरणीय गिरिजेश राव जी के मोबाइल कैमरे से खिंची तस्वीरें ब्लूटूथ पर सवार होकर मेरे लैपटॉप पर आतीं और लाइव राइटर द्वारा सीधे ब्लॉग-पोस्ट में जा समातीं। क्षणभर में ट्रेनिंग देते विशेषज्ञ और सीखते प्रशिक्षु नेटतरंगों पर सवार हो अन्तर्जाल की सैर पर निकल पड़ते।

कार्यशाला हम तो इस अनुभव को आपसे यहाँ बाँटने को उतावले थे कि कैसे देखते-देखते एक आर्ट्‌स  साइड(मानविकी)  के साधारण विद्यार्थी से हम एक वैज्ञानिक सेमिनार के विशेषज्ञ बन गये। धन्य है यह ब्लॉगरी जो एक राई को पहाड़ बनाने की क्षमता रखती है। इस प्रक्रिया का सच्चा उदाहरण बनने का अनुभव बाँटकर मैं बहुतों को अचम्भित करने की तैयारी में था। लेकिन यह हो न सका। पहला कारण तो बनी वर्धा में कुछ समय के लिए वीएसएनएल की ठप पड़ गयी इंटरनेट सेवा, जिससे लिखना विलम्बित हो गया। लेकिन दूसरा बड़ा कारण बना मेरे उस भ्रम का ही टूट जाना जो आदरणीय डॉ. अरविंद जी की निम्न महत्वपूर्ण टिप्पणी से सम्भव हुआ-

Arvind Mishra said...

वैज्ञानिक समागमों में सत्र का अध्यक्ष ही मंच का संचालन करता है -इस कार्यशिविर में एक अनजाने में हुयी कमी रह गयी कि आयोजकों में से किसी ने आहूत विशेषज्ञों के लिए आरम्भ में एक उद्बोधन नहीं रखा -संभवतः यह मानकर कि उन्हें वैज्ञानिक आयोजनों के प्रोटोकाल मालूम होंगें .-वैज्ञानिक सम्मलेन और पारम्परिक साहित्यिक सांस्कृतिक सम्मेलनों के प्रोटोकोल थोडा अलग होते हैं -
बाकी तो यह देवी का भड़रा नहीं था -न ही चलो बुलावा आया है जैसा कोई आयोजन -अनाहूत ब्लॉगर वहां न पहुच कर विवेक का काम तो किये ही अपनी अनुपस्थिति से आयोजन को सफल बनाए में योगदान भी किये -उनकी अनुपस्थिति इस लिहाज से उभरती गयी ....
बाकी आप लोगों के खान पान रहन सहन अवस्थान में आयोजकों ने शायद ही कोई कसर छोडी हो -समय पर बेड टी के साथ लंच और डिनर भी ....और रहने के ऐ सी कमरे -इन उज्जवल पक्षों को भी इस लम्बी रिपोर्ट में समेटते तो वृत्तांत का सही परिप्रेक्ष्य भी उभरता -किसी विशेषग्य के साथ कोई भेद भाव भी नहीं था -जैसे किसी को ऐ सी तो किसी को नान ऐ सी ...आपने इन बातों को भी नोट किया होगा ..हाँ अन्य विशेषज्ञों को ऐ सी २ का भुगतान किया गया था क्योंकि उन्हें एन सी एस टी सी का अनुमोदन प्राप्त था .....और उनके मानदेय भी अधिक थे ...... ये अनुभव आपके कम आयेगें -इन्हें सहेज कर रखें !
बाकी उदघाटन सत्र की अध्यक्षता के लिए बधायी -तेल बाती के लिए तो हम काफी थे ...आपने क्यों जहमत उठाई ? अगर उठाई तो ! और यह तो व्यक्ति की सहजता और विनम्रता का परिचायक है न कि कटूक्ति का -सायिनिज्म का !

Monday, 30 August, 2010

अब मैं तो किंकर्तव्यविमूढ़ सा इसे देखता रहा। अपनी पोस्ट इस टिप्पणी के आलोक में दुबारा पढ़ी, तिबारा पढ़ी…। इसकी शुरुआत ही इन पंक्तियों से की थी, “जब मैंने वर्धा से लखनऊ आने के लिए टिकट बुक कराया तो मन में यह उत्साह था कि हिंदी ब्लॉगरी की यात्रा मुझे एक ऐसे मुकाम पर ले जाने वाली है जहाँ अपनी तहज़ीबों और नफ़ासत के लिए मशहूर शहर की एक शानदार शाम अपने् प्रिय ब्लॉगर मित्रों की खुशगवार सोहबत में बीतेगी।”

फिर बाकी टिप्पणियाँ भी दुबारा देख डाली। कन्फ़्यूजन बढ़ता गया। फिर मैने सोचा कि वे बड़े  भाई हैं,  अनुभवी ब्लॉगर हैं, मेरे शुभेच्छु हैं और सबसे बढ़कर एक वैज्ञानिक हैं और विज्ञान प्रसारक हैं इसलिए जो कह रहे हैं वह ठीक ही कह रहे होंगे। मैंने मन ही मन हाथ जोड़कर उन्हें धन्यवाद दिया।फिर लगा कि यह धन्यवाद तो उनतक पहुँच ही नहीं पाएगा। सो मैंने उन्हें प्रति-टिप्पणी  के माध्यम से जवाब देना चाहा। जब टिप्पणी टाइप कर चुका तो पब्लिश बटन दबाने के पहले इसे कॉपी करके सेव कर लेना जरूरी समझ में आया। दर‌असल ब्लॉगर वाले कई बार गच्चा दे चुके हैं। अक्सर लम्बी टिप्पणियों को गायब करके ‘सॉरी’ बोल देते हैं। कमाल देखिए कि हुआ भी वही जिसकी आशंका थी। टिप्पणी लम्बी थी, गायब हो गयी। अब मजबूरी में वह टिप्पणी यहाँ प्रस्तुत कर रहा हूँ।

आदरणीय अरविंद जी,

मैने इस पोस्ट में इस कार्यक्रम की इतनी आलोचना कर दी है यह तो मुझे पता हि नहीं था। वह तो भला हो आदरणीय अली जी, रविन्द्र प्रभात जी और आपका जो मुझे इस बात का पता चल गया। आप तीनो का हार्दिक धन्यवाद।

ब्लॉगर्स की अनुपस्थिति की चर्चा तो मैने व्यक्तिगत स्तर पर उन्हें ‘मिस’ करने के कारण की थी। वर्धा से लखनऊ जाकर मैं उम्मीद कर रहा था कि अनेक बड़े लोगों से मुलाकात होगी, सुबह शाम की गप-शप और अनुभवों का आदान-प्रदान होगा। लेकिन मुझे क्या पता था कि मेरी निजी इच्छा का पता चलते ही आपलोग आहत हो जाएंगे। मुझे यह कार्यक्रम स्थल पर पहुँचने के बाद पता चला कि यह गैर ब्लॉगर को ब्लॉगर और वह भी साइंस ब्लॉगर बनाने की कार्यशाला थी जो सरकार द्वारा विज्ञान के प्रचार-प्रसार के उद्देश्य की पूर्ति के लिए चलायी जा रही एक योजना का हिस्सा थी। वहाँ ब्लॉगर भाइयों को न पाकर मेरी सहज प्रतिक्रिया थी यह पोस्ट, न कि कोई शिकायत।

आप द्वारा गिनायी गयी खान-पान, रहन-सहन, बेड-टी, ए.सी., नॉन-ए.सी., मानदेय, ऑटो, टैक्सी जैसी बातों पर ध्यान देना, तुलनात्मक अध्ययन करना और उसकी समीक्षा करना मुझे बहुत तुच्छ काम लगता है, इसलिए अपनी पोस्ट में उसका जिक्र न करने पर मुझे कोई पछतावा नहीं है। मेरे हिसाब से आयोजन के तमाम दूसरे उज्ज्वल पक्ष थे जिनका लिंक मैने इस पोस्ट में दे दिया था। समय पाकर मैं भी कुछ बताने की कोशिश करता लेकिन इसके पहले ही ‘सिनिकल’ होने का ठप्पा लग गया।

वैसे दूसरे दिन के प्रथम सत्र में मैंने साइंस ब्लॉगर्स एसोसिएशन के ब्लॉग पर लाइव कमेण्ट्री पोस्ट करने की कोशिश की थी। जिसे आपने कदाचित्‌ पसंद भी किया था।

एक गलती आयोजकों ने जरूर की जिसे मैं अब समझ पाया हूँ। इतने बड़े और उत्कृष्ट वैज्ञानिक आयोजन में एक अदने से अवैज्ञानिक ब्लॉगर को बुला लिया और उसे उद्‍घाटन सत्र में मुख्य अतिथि के बगल में बिठा दिया, जिसे किसी प्रोटोकॉल की जानकारी भी नहीं थी। इतना ही नहीं, मुख्य अतिथि भी भले ही दो-दो विश्वविद्यालयों के कुलपति रह चुके हों लेकिन ब्लॉगिंग के बारे में उनकी जानकारी भी उतनी ही थी जितनी डॉ.अरविंद मिश्र ने उद्घाटन के ठीक पहले उन्हें ब्रीफ किया था। एन.सी.एस.टी.सी. से एप्रूव कराने का काम आयोजकों का ही था तो ‘अनएप्रूव्ड’ व्यक्ति को बुलाने की गलती कैसे हो गयी?

मैं तो गलती से इतने सम्मानित मंच पर बुला लिया गया, इसलिए अब आपकी बधायी स्वीकारने में भी संकोच का अनुभव कर रहा हूँ। आपने मुझे ए.सी. कमरे में ठहरा दिया इस बात को छिपा ले जाने की मेरी कोशिश असफल हो गयी, शर्मिंदा हूँ।

मैंने अपनी पूरी पोस्ट बहुत हल्के-फुल्के अंदाज में लिखने की कोशिश की थी लेकिन यदि इसमें कोई कटुक्ति आ गयी है तो इसे मैं अपनी असफलता ही मानता हूँ। सादर खेद प्रकाश करता हूँ।”

IMG443-01 तो मित्रों, मैं एक बार फिर बता दूँ कि मेरी पिछली पोस्ट पर अन्जाने में मुझसे जो घनघोर आलोचना हो गयी थी वह मेरे अनाड़ीपन के कारण हो गयी थी। सच तो यह है कि मैं इस कार्यक्रम में नाहक ही बुला लिया गया था। अब इसपर NCSTC क्या रुख अपनाती है इसे सोचकर थोड़ा चिंतित हूँ। जैसा कि आदरणीय विद्वत्‌‍जनों ने बताया है कि  कार्यशाला बेहद उम्दा और उत्कृष्ट कोटि की थी, इसमें लखनऊ के ब्लॉगर्स का कोई काम ही नहीं था, मैंने उन्हें नाहक ही याद किया। इसलिए मैं अपनी गलती मानते हुए पुनः खेद प्रकाश करता हूँ।

(सिद्धार्थ शंकर त्रिपाठी)

17 comments:

बेचैन आत्मा said...

....

अनूप शुक्ल said...

अच्छा लिखा है।
एक शेर याद आ रहा है-
मैं सच बोलूंगी हार जाऊंगी,
वो झूठ बोलेगा,लाजबाब कर देगा।


वैज्ञानिक चेतना और प्रसार के चलते मैं उस दिन की कल्पना कर रहा हूं जब ऐसे सम्मेलनों में जाते ही आपको आयोजकों की तरफ़ से आंखे, बुद्धि और तमाम जरूरी चीजें इशू हो जायेंगे। सम्मेलन में आप वैसे ही रहें, बोले, प्रतिक्रियायें करें जैसा आयोजक चाहता है। विदा होते ही आपकी बुद्धि अनुभव धरा लिये जायेंगे ताकि बाद में आप अपनी बुद्धि और अनुभव से कुछ प्रकट करने में असमर्थ रहें।

यह पोस्ट आपके सदव्यवहार की परिचायक है। इससे लगता है इधर-उधर के बहाने से आप अपनी बात झूठ-मूठ सही साबित करने की फ़िजूल कोशिश करने की बजाय अफ़सोस जाहिर करना बेहतर समझते हैं। यह बेहतर मन की निशानी है। बड़ी समझ का प्रमाण।

अब यह अलग बात है कि इसके चलते चीजें और ज्यादा उघड़ गयीं। लेकिन उसमें आपका दोष नहीं।

गिरिजेश राव said...

मेरे हर उजाले दाग दाग क्यों हैं?

महेन्द्र मिश्र said...

मै अनूप जी की टीप से सहमत हूँ ..... आभार

प्रवीण पाण्डेय said...

यह सम्मेलन अत्यधिक सफल रहा और इसके लिये सभी आयोजनकर्ता बधाई के पात्र। आपकी पोस्ट में मैने तो आत्मीयता ही पाई सबके लिये।

Arvind Mishra said...

अनूप जी एक शेर को यत्र तत्र पचास बार लिख चुके हैं जो मूलतः एक महिला ब्लॉगर ने कभी लिखे थे ....:) (महिला प्रभाव हा हा )
जहाँ तक आपकी बात है सिद्धार्थ जी ,आप अपने बायोडाटा में इस उपलब्धि को डाल देगें तो (जो आप डालेगें ही ) तो आगे भी आपको फायदे होंगे ...
निश्चय ही उस कार्यक्रम में आपको आमंत्रित करने का कोई कारण न था ,हाँ केवल तकनीकी कारण यह था की आप साईंस ब्लागर्स के मेम्बर हैं ...
बातें बढ़ जायेगीं ,बड़े भाई का औपचारिक ओहदा देते हैं आप तो ,इसका निर्वाह भी मुझे करना होगा ..बंधा हूँ ..
आप को खुद अभी एक सम्मलेन आयोजित करना है -वहां बातों को तुच्छ मानकर मत चलियेगा इतना हिदायत दे ही दे रहा हूँ ..
बाकी जागतिक और सांसारिक होशियारी आपमें खूब है इतना तो अब तक देख ही लिया है मैंने ...
अनूप जी को प्लेन से बुलाने का आमंत्रण दिया या नहीं ?
निश्चित ही एन सी एस टी सी की वर्कशाप घटिया थी ....आप एक बढियां (पहले की तरह नहीं ) सेमीनार करें -शुभकामनाएं !

Shiv said...

पहली पोस्ट पढ़ी थी. बहुत बढ़िया लगी. यह पोस्ट भी बढ़िया है. कुछ बातें हो जाती हैं जिन्हें आप नहीं चाहते. कुछ बातें हो जाती हैं जिन्हें कोई नहीं चाहता. लेकिन हो जाती हैं. यह दुर्भाग्यपूर्ण है.

@अरविन्द जी
ह्यूमेंटीज वालों को साइंस सेमिनार में बुला लिया आपने. कभी कामर्स वालों को भी बुलाइए...:-)

रचना said...

great to know all top bloggers are celebrating their friendship without being affected to blog turbulence

what else is bloging for

राज भाटिय़ा said...

जन्माष्टमी की बहुत बहुत शुभकामनायें।

रंजना said...

भाटिया जी ने सबसे सही कहा है...

" जन्माष्टमी की बहुत बहुत शुभकामनाएं "

cmpershad said...

पहले यह बताइये कि यह कार्यशाला थी या शोधशाला और क्या सारे वैज्ञानिक एप्रान पहन कर आए थे... अपने मुंह पर मास्क लगाए :)

महाशक्ति said...

लम्‍बे अरसे बाद आज आपको पढ़ने का मौका मिला, 28 अगस्‍त को केएम मिश्र जी की तरफ से आयोजित रेस्‍त्रा तंदूर मे एक बैठकी मे वीनस केसरी से पता चला कि आप लखनऊ मे है, और वही पता चला लखनऊ मे ऐसा कोई कार्यक्रम हो रहा है, मन था कि चल के ब्‍लाग पर देखेगे कि क्‍या हो रहा है पर ....... आज ही आना हो पाया।

जो भी कार्यक्रम अच्‍छा होना चाहिये, जो मुद्दे हो वो कार्यक्रम मे निस्‍तारित कर लेना चाहिये, हो सके तो एक घंटे का विवादित अवर भी रख सकते है :), पर यह ठीक नही कि सॉप के जाने के बाद सभी ब्‍लागर अन्‍य-2 मुद्दे पर लाठी पीटते नज़र आये।

आपको पढ़कर मन आनन्दित हुआ।

आप का अपना

कृष्ण मोहन मिश्र said...

अनुप जी का अंदाज ही निराला है । चाहे फुरसतिया टाईप लेख हो या फिर बेबाक टिप्पणी ।

mare gaye gulfaam said...

मुहब्बत मेँ बुरी नज़र से कुछ भी/ सोचा नहीँ जाता/ कहा जाता है बहुत कुछ/ पर बहुत कुछ समझा नहीँ जाता/ बरखुरदार... वे नखधर जब बसेरे के लिए लौटेँ/ सलीकामंद शाखोँ का लचक जाना जरूरी है।

honesty project democracy said...

सिद्धार्थ शंकर त्रिपाठी जी आपका सोच सचमुच अच्छा लगा ,बुद्धिमान व्यक्ति के अभिव्यक्ति को दर्शाता पोस्ट ,यहाँ मैं यह भी कहना चाहूँगा सबको की योग्यता किसी कागजी प्रमाणपत्र की मोहताज नहीं होती है और ना ही किसी व्यक्ति को प्रमाण्पत्र के आधार पर तौलना चाहिए ....

विनोद शुक्ल-अनामिका प्रकाशन said...

मैं भाई अनूप शुक्ल जी से सहमत हूं। और अच्छे शेर दो-चार बार नहीं, हजार हजार बार लिखे और पढे जाने चाहिये। जहां तक महिला प्रभाव की बात है, तो पुरुष का तो जन्म ही नारी की कोख से हुआ है। अरविन्द जी आयोजक थे, और आयोजक को धैर्यवान होना चाहिये। कोई भी आयोजन, बेटी की शादी की तरह होता है। अच्छाई और बुराई, दोनो के लिये आयोजक को तैयार रहना चाहिये। दोनो लोग मन की कटुता मिटाकर अगले कार्यक्रम के लिये कमर कस कर तैयार हों तो अच्छा होगा।

Leena Mehendale said...

नमस्कार
अगस्त 2008 में कभी आपने लिखा धा कि इनस्किप्ट को कम्प्युटर पर उतारनेका तरीक आपको नही मिल पाया धा। अब मैं अपनी ओर से पुनः प्रयत्न कर रही हूँ कि इस बाबत जनजागरण करूँ. कृपया संपर्क बनायें और यह पोस्ट भी देखें--


http://leenamehendale.blogspot.com/2010/08/blog-post_03.html --leena.mehendale@gmail.com