Thursday, December 22, 2011

ठंड में यूँ याद आया बचपन…

 

camp-fireलखनऊ की ठंड भी कंपाने वाली है। ऑफिस से लौटने के बाद आग तापने से अच्छा कुछ भी नहीं लगता। अपार्टमेंट फ़्लैट की लाइफ में आंगन में अलाव जलाकर तापने का सुख तो नहीं मिल पाता लेकिन हमने उसकी भरपाई कुछ ऐसे कर ली। अंगारे बड़े प्यारेलोहे का पोर्टेबल ‘हवनकुंड’ लकड़ी और कोयले की आग जलाकर तापने के काम आ रहा है। पड़ोसियों से मेल मुलाकात का बहाना भी।

 

 

 

***  ***  ***

child-hood days 001आज पुराने कागज टटोलते हुए एक मुड़ा-तुड़ा पन्ना हाथ लगा तो मन खुश हो गया। बात उन दिनों की है जब कम्प्यूटर से भेंट नहीं थी लेकिन कुछ तुकबन्दी जोड़ लेने का शगल फिर भी आता-जाता रहता था। ऐसे में कागज पर लिखा हुआ आइटम जेब में कुछ दिनों साथ घूमता, फिर जब आसपास के सबलोग पढ़-सुन लेते तो बासी अखबार की तरह कहीं कोने में पड़ रहता। बचपन की देहरी लाँघते हुए जब तरुणाई की ओर कदम बढ़ रहे थे उन्ही दिनो ननिहाल में ये भाव उपजे थे। एक मौसी का जन्मदिन था। माँ की फुफेरी बहन थीं और हमउम्र थी इसलिए ‘नीलूमोछी’ कहा करते थे। “हैप्पी बर्डे” कहने का शऊर सीखा नहीं था इसलिए ‘सुखी और चिरायु होने की शुभकामनाएँ’ देने के लिए यह कविता रच डाली थी। इसमें शुभकामना कहाँ छिपी है यह आप खोजिए, मैं तो कविता ठेलता हूँ।

मेरे मन कर वन्दन प्रभु से अब सबकुछ मंगलकारी हो।

रीते दिन बीतें अब अपनी एक हरी भरी फुलवारी हो॥

नील गगन में पंछी सा उड़ने को मन ललचाता है।

लूटे थे जो सुख बचपन में उन सबकी याद दिलाता है॥

मोहक नानी के घर की सारी बातें प्यार लड़ाई की।

छीना-झपटी का खेल और चुपके से मिली मिठाई की॥

सब धमा-चौकड़ी लुका-छिपी फिर भोली-भाली किलकारी।

दैनिक जीवन निश्चिन्त अहा, अल्हणता कैसी थी प्यारी॥

वह खेल-कबड्डी, गुल्ली-डंडा, भाग-दौड़ वह अठखेली।

सुबके रोये भी वहाँ और मुस्कान खिली भी अलबेली॥

खींच चुकी है मन में गहरी अमिट रेख उन यादों की।

हों विस्मृत कैसे वे पल-छिन वे घड़ियाँ मीठे वादों की॥

चिरकाल हमारे जीवन में सब रचा-बसा रह जाएगा।

राहें जीवन की जहाँ मिलें सबकुछ पहचाना जाएगा॥

युग बचपन का बीता, आयी तरुणाई तो अपनाएंगे।

होंठों पर हो मुस्कान अमिट ईश्वर से यही मनाएंगे॥

 

 

 

 

 

 

 

 

 

 

 

 

 

 

 

 

 

-सिद्धार्थ शंकर त्रिपाठी         

8 comments:

Smart Indian - स्मार्ट इंडियन said...

सही है! सर्दी की भरक का आनन्द भी लेना चाहिये।

प्रवीण पाण्डेय said...

बचपन की वह स्मृति मधुरिम,
काश काश बचपन फिर आये।

अनूप शुक्ल said...

बड़ी चकाचक कविता है। कविता के पीछे का सीन और चकाचक है। उछलते-कूदते बच्चे।

चंद्रमौलेश्वर प्रसाद said...

necessity is the mother of invention कह गए ज्ञानी लोग। पोर्टेबल हवनकुंड बनाने के लिए बधाई... पेटेंट करा लीजिए... लखनऊ में चोरों की कमी नहीं है:)

अनुपमा त्रिपाठी... said...

कल 24/12/2011को आपकी कोई पोस्ट नयी पुरानी हलचल पर लिंक की जा रही हैं.आपके सुझावों का स्वागत है .
धन्यवाद!

यशवन्त माथुर (Yashwant Mathur) said...

बहुत ही बढ़िया कविता है सर!


सादर

रंजना said...

हाथ पैर ठण्ड से सिकुड़ रहे हैं...ऐसे में एकदम उसी अलाव सी लगी आपकी यह कविता जिसके चित्र आपने अपनी प्रविष्टि में टांक रखे हैं..

दोनों ही सुखद, मनोहारी...कविता भी और आधुनिक "बोरसी" भी...

बढ़िया आइडिया मिला...इसे ham भी आजमाएंगे..

GYANDUTT PANDEY said...

हवनकुण्ड मुबारक! पूरी सर्दी हवनकुण्ड का सेवन करें और प्रसन्न रहें!